ठूँठी डाल और नया झोंका - प्रेरणात्मक कविता

ठूँठी डाल और नया झोंका

एक नौसिखिए अनाड़ी झोंके के हठ की हार, और एक ठूंठी डाल की विजयी आशा से भरी प्रतीक्षा


अपनी लिखी सारी कविताओं में, ये कविता मेरी सबसे प्रिय है. वो इसलिए कि कुछ वर्ष पहले लिखी इस कविता में आशा के से भरा भरोसा है, अच्छे समय के आने की प्रतीक्षा है. सच में, ये उम्मीद ही तो है, जो हमें मुश्किल से मुश्किल समय में भी हार नहीं मानने को प्रेरित करती है. प्रकृति के अभिन्न रंगों को अपने में समेटे प्रतीकात्मक शब्द मुझे हमेशा ही अत्यंत मोहक लगते हैं. इस कविता में डाली और झोंका प्रतीक मात्र हैं. डाली अटलता की, दृढ़ निश्चय की. और झोंका मन के अंदर अनायास ही ज़ोर मारते, कुतर्की हठ की. ये दोनों हमारे ही मन का हिस्सा हैं. तो प्रकृति है मन की प्रतीक - जिसमें सब समाहित है. ये नया झोंका, और डाली एक दूसरे के शत्रु भी हैं, और पूरक भी. सब समय के अधीन है. और उससे भी बढ़कर, हमारी चेतना के अधीन.


झोंका वो नया सा था,
वो मनचला मचल उठा,
खेल क्या करूँ नया,
वो बनके इक हलचल उठा,


डाली थी वो ठूंठ सी,
तो सोचा - गिरा दूँ मैं,
वृक्ष तो विशाल है,
डाली को तो हरा दूँ मैं,


वो ज़ोर-ज़ोर बह उठा,
पुरज़ोर कोशिशें करीं,
पर डाली थी विचित्र ही,
वो हर प्रहार सह गई,


झोंका वो नया सा था,
ज़ोर जब चला नहीं,
दृढ़ निश्चय वाली डाली
का ठूंठ जब हिला नहीं,


वो चिढ़ हार के पुकार उठा,
ऐ डाली मुझको ये बता,


कि फूल-फूल झर गया,
हर पात है बिखर गया,
फिर तू क्यूँ खड़ी रही,
आखिर क्यूँ तू अड़ी रही,


क्यूँ खेलती है जा रही,
क्यूँ मेरे हर इक वार को,
क्यूँ हर इक प्रहार को,
तू झेलती है जा रही,


इस हार पर बवाल को,
सुन नासमझ सवाल को,
डाली मुस्कुरा पड़ी,
बोल उठी वो उस घड़ी,


तू झोंका है नया सा,
तू कुछ भी जाने नहीं,
समय रहे ना एक सा,
तू मूरख माने नहीं,


हैं फूल-फूल झर गए,
हैं पात सब बिखर गए,
पर फिर भी मैं खड़ी रही,
हर वार पर अड़ी रही,


क्यूँकी जानती हूँ मैं,
कि फिर बहार आएगी,
पात-पात हरे भरे,
वो पुष्प फिर खिलाएगी,


मैं फिर हरी हरी सी,
कली-कुसुमों से भरी सी,
नाज़ से इठलाउंगी,
गीत गुनगुनाउंगी,


और बदल जाएगा तू
समय के प्रभाव से,
तू मंद-मंद बह के
कली-कली सहलाएगा,


कोकिला की कूक को
दे संगत बहाव से,
तू छंद-छंद एक एक
प्रेम से सुनाएगा.

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