चुटकुलों के मुख से

चुटकुलों के मुख से…

बातचीत करते चुटकुले

मैडम बहुत बिज़ी है.

दो चुटकुले साथ साथ जा रहे थे. पहला चुटकुला बहुत खुश था. हंसते हंसते उसका बुरा हाल था. दूसरा गुमसुम था, लग ही नहीं रहा था, कि चुटकुला समाज का ये भी सदस्य है.

गुमसुम चुटकुले ने पूछा, "क्या बात है यार, तुम तो बड़े खुश हो… नई ड्यूटी किसी मसखरे के दिमाग में लगी है क्या?"

'अरे नहीं यार, मसखरों को तो नए नए जोक्स चाहिए घड़ी-घड़ी. वहाँ एक अदने चुटकुले की क्या पूछ-परख? मैं तो आजकल सिद्धू जी के दिमाग में अपोइंटेड हूँ. कमाल है यार, बार बार मुझको सुनाते हैं, हर बार अलग तरह से हंसते हैं, बड़े ही हंसमुख आदमी हैं.'

फिर हंसी छोड़ ध्यान साथी पर गया, 'यार तू तो बहुत गुमसुम लग रहा है… कहीं किसी बड़े अस्पताल के बड़ी बीमारी के बड़े सीरियस डाॅक्टर के संग तो नहीं फंस गया?'

'हँुह! डाक्टर भी सीरियस मरीजों के साथ ही सीरियस होते हैं यार. बाकी तो हंसते मुस्कुराते है. अपने साब को तो मुस्कुराने की भी परमिशन चाहिए, और मैडम तो खुद ही मीडिया के सामने आँसू टपकाने से फुरसत नहीं मिलती. परमिशन नहीं मिलती यार, मैडम बहुत बिज़ी है.'

'अरे, तेरा परफोरमेंस तो अच्छा था यार, तेरे को तो विशेष व्यक्ति मिलने वाला था, ये क्या हुआ?'

'अभी भी नहीं समझा क्या? व्यक्ति तो विशेष ही है, प्रधानमंत्री जी की सेवा में हूँ!!'

'ओ… सॉरी यार…'

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किस क़िस्म के चुटकुले?

तीन चुटकुले बैठे चाट खा रहे थे.

पहले चुटकुले ने कहा, "क्या फायदा स्मार्ट जोक होने का, हूँ तो मैं तकनीकी चुटकुला. इंजीनियर लोगों के ही समझ में आता हूँ… मेरी क़िस्म के बाकी चुटकुले भाइयों की और भी बुरी हालत है. जितना अच्छा जोक, उतने कम इंजीनियर्‌स के पल्ले पड़ता है. डिलबर्ट भाइ का ही सहारा है, फेसबुक पर शेयर होते रहते हैं, वरना हमारी क़िस्म तो विलुप्त हो जाएगी."

दूसरे ने कहा, "भाई, तुमने निर्माण के वक्त क़िस्म-डिमांड पर ध्यान देना था ना! मुझे देखो, श्रीमान-श्रीमती चुटकुले को सुन सभी हंसते हैं, चाहे शादी हुई हो या नहीं. यार, कुछ श्रीमान तो ना समझ आने पर भी जोर का ठहाका लगा देते हैं, अपनी श्रीमती को चिढ़ाने के लिये…"

तीसरा जरा चिड़ कर बोला, "किस्म-डिमांड से कुछ नहीं होता है. सब किस्मत की बात है. तकनीकी जोक को सुन कर कम से कम इंजीनियर तो हंसते हैं, हम राजनीतिक चुटकलों को देखो, नेता मुंह फुला लेते हैं, जनता अगल-बगल झांक कर ही डरते डरते खिसिया पाती है… और फेसबुक की तो बात न करो, पुलिस और जेल का भी डर है… "

व्यंग्य मंथन - लोकतंत्र खुद ही चुटकुला न बन जाए…

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