चीज़ों से बतियां | जयोम के मुख से

चीज़ों से बतियां

जानता नहीं कि जान नहीं

अब छोटा सा जयोम क्या जाने, कि बेजान चीज़ें उसकी बात नहीं सुन सकतीं :) वो तो सब से बातें करता है.

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मेरे फोन को जयोम रजाई से बने गुम्बद पर फिसला रहा था. एक बार फिसला, दो बार फिसला, तीसरी बार में ज़रा अटक गया. तो उससे कहने लगा, "यहां से गिरो” :)

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सुमन दीदी को अलमारी में हैंगर लगाते देख रहा था. अलमारी का दरवाज़ा बार बार बंद हो रहा था. दीदी के अड़ रहा था. जयोम को बड़ा गुस्सा आया उसकी इस धृष्टता पर. तो दरवाज़े से बोला, “अभी रुको, दीदी.. कपड़े.. लगा री है. अभी रुको” :) बिल्कुल ऐसे डांट रहा था, मानो किसी बुद्धू को ज्ञान दे रहा हो.

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एक दिन कुछ खा रहा था. अपने हंसने वाले गुड्डे से बोला, “लो, खा लो” :) गुड्डे को शायद भूख नहीं थी, नहीं खाया.

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मेरा पुराना सा फोन है. बेझिझक उसे खेलने दे देती हूं. एक खास बटन दबाने पर, एक महाशय कहते हैं, “नो मैसेज रिसीव्‌ड” यानि कोई संदेश नहीं मिला. जयोम को लगता है, कि ये महशय उसी से बात कर रहे हैं. तो वो फोन पर कहने लगता है, “हैलो, हौवा यू”

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कभी किसी चीज़ से टकराकर या गिरने से जयोम को चोट लगती है, तो हम सब उस चीज़ को झूठमूठ का डांट देते हैं. तो अब जयोम भी पलंग/सोफे के कोने आदि को डपट लगाता है.. “शरम... आती... नई?” यानि, शरम नहीं आती, मुझ छोटे से बच्चे को चोट लगा दी?? :D

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